वरिष्ठ गीतकार ऋषि शृंगारी की अध्यक्षता में भोपाल पोइट्री अड्डा का दूसरा आयोजन सुख़न की कहकशां 7 सितम्बर 2025 रविवार शाम 5.00 बजे दुष्यंत कुमार संग्राहलय भोपाल में आयोजित हुआ। नम्रता श्रीवास्तव, डॉ. एहसान आज़मी, नफ़ीसा सुलताना ”अना“, अदीब दमोही (दमोह), शिवांश पराशर ‘राही; (सागर) ने मुख्यअतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन ग़ोसिया ख़ान सबीन ने किया। इस आयोजन में वरिष्ठ एवं युवा रचनाकारों को आमंत्रित किया गया था जिसमें ग़ोसिया ख़ान सबीन, साजिद प्रेमी, सोहेल उमर, अज़ीम असर, ताहा उल हुसैनी, अशफ़ाक़ अंसर, रूपाली सक्सेना ‘ग़ज़ल’, मनस्वी अपर्णा, कमलेश ‘नूर’, समीना क़मर, सईद खान शहंशाह, फेकू भोपाली, उमेश मिश्र, प्रद्युम्न शर्मा, बी.एन. तिवारी, महावीर सिंह नारायण, अनवर मोहम्मद शान, एस.एम. मुबश्शिर किया गया था।
रचनाकारों ने अपनी चयनित रचनाएं प्रस्तुत कीं जिसमें :-
हद किसी की नापना मैंने नहीं सीखा/फिर भला कैसे किसी तूफ़ाँ से डर जाऊँ-ऋषि श्रृंगारी, ये अदब की महफिलें ये रतजगे/तुमसे मिलने का कहाना हो गया/ छोड़ नम्रता फिर कोई ताज़ा ग़ज़ल/आज मौसम शायराना हो गया-नम्रता श्रीवास्तव, ”मैं“ की दीवार जो इक बार गिरा सकता है/राह की कोई भी दीवार गिरा सकता है- डॉ. एहसान आज़मी, इतनी तो ”अना“ आपकी फितरत में है लाज़िम/खुद्दार को फिरते हुऐ दर-दर नहीं देखा- नफीसा सुलताना ‘अना’, ज़ख़्म खाकर भी परिंदा न रूका उड़ता रहा/हाथ मलता ही रहा तीर चलाने वाला-अदीब दमोही, इश्क़ के दर्या में लाए जिस्म की ही मछलियाँ/मैं समझता था के इसमें कुछ नया ढूँडेंगे लोग-शिवांश पराशर ”राही“, यह ज़र्फ़े सुख़न है के ग़ज़ल कहती रही हूँ/दुश्मन मेरा जलता है जले मेरी बला से-ग़ोसिया ख़ान सबीन, अगर आओ तो है सोना सनीचर/न आओ तुम तो हो इतवार मिट्टी-साजिद प्रेमी, सजदा भी सिर्फ एक आदत है/अब इबादत कहाँ इबादत है-सोहेल उमर साहिल, गुलशन में रोज रोज़ ही तुम ढूंडते हो क्या/कोई भी फूल तुमसा नहीं है यक़ी करो-अज़ीम असर, देख कर मजबूर माँ को दिल पे इक झटका लगा/दस बरस की उम्र ही में काम पर बच्चा लगा-ताहा उल हुसैनी, हमें बहुत तलाश किया मिल नहीं सका/ऐसा कोई के आपके जैसा कहें जिसे-अशफ़ाक़ अंसर, सो रहा है जाने क्या क्या अपनी लालच/लालची हर शख़्स फिर भी ग़फ़लतों में क़ैद है-रूपाली सकसेना ‘ग़ज़ल’, आई हूँ उससे कहने कोई बात बैठकर/कहना है हाँ कहूँगी मगर पास बैठकर-मनस्वी अपर्णा, फैलाव गगन का, मेरे आँगन की तरह है/हिम्मत का मेरी आपने, राह पर नहीं देखा-कमलेश नूर, लम्हा-लम्हा क़यामत का लम्हा है अब/एक पल इक सदी है चले आईये-समीना क़मर, कोई तो आएगा कभी न कभी/रात की ताक़ पर दिया रखना-ए.एम.के. शहंशाह, हमारे वास्ते इतना दुलार किसका है/लटक रहा है जो जूतों का हार किसका है-फेंकू भोपाली, छतों पर अब नहीं आते, हसीं जोड़े कबूतर के/ वहां पर बाज की आमद कहीं से हो रही है-उमेश मिश्रा, अब कहा जाने लगा उर्दू इसे/नाम पहले था इसीका रेख़्ता-प्रद्युम्न शर्मा, हमें िल जुल के रहना था यही तो तय हुआ था/ चमन में फूल लिखना था यही तो तय हुआ था-बी.एन. तिवारी, आपको चाहा था हमने भोली सूरत देखकर/आपने चाहा हमें अपनी ज़रूरत देखकर-महावीर सिंह नारायण, वो हुस्न अब कहा हैं नगीना कहें जिसे/ मेकअप बिना भी लोग जमीला कहें जिसे-अनवर मो. खान, दश्ते वहशत में छोड़कर गया था/पहनू अब शर्ट या कफ़न तुम्हें क्या-एस.एम. मुबश्शिर अंत में अध्यक्ष एस.एम. मुबश्शिर ने सभी श्रोता, साहित्यकार, शायर एवं मुख्य अतिथियों तथा प्रेस से आये पत्रकार एवं छायाकारों का आभार व्यक्त किया।


