मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग तथा आयुक्त संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय साहित्यिक उत्सव “जश्ने उर्दू-2026” का तीसरा दिन साहित्य, विचार-विमर्श, हास्य और मंचीय प्रस्तुतियों से भरपूर रहा।
इस दिन प्रथम सत्र में आयोजित प्रादेशिक मुशायरे में प्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। मुशायरे की अध्यक्षता विदिशा के उस्ताद शायर निसार मालवी ने की। लतीफ़ शाहिद (बुरहानपुर), ज़हीर राज (इंदौर), जीवन एस. रजक (भोपाल), रईस अनवर (इंदौर), परवेज़ अख़्तर (भोपाल), साजिद प्रेमी (भोपाल), महावीर सिंह (भोपाल), शाहनवाज़ असीमी (उज्जैन), निवेश साहू (दतिया), गोविंद गीते (खंडवा), आमिर अज़हर (भोपाल), सुभाष पाठक ‘ज़िया’ (शिवपुरी) एवं नज़ीर नज़र (ग्वालियर) ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।
मुशायरे का संचालन मन्नान फ़राज़ (जबलपुर) ने किया।
पढ़े गए अशआर...
किसी भी देश में रहिये किसी भी भेस में रहिये
तिरा किरदार कह देगा कि तू हिंदोस्तानी है
निसार मालवी
अपनी तकमील के एहसास पे मग़रुर न हो
जब मुकम्मल हो कोई शय तो ज़वाल आता है
लतीफ़ शाहिद
हमारी मौत भी इक इस्तिआ़रा छोड़ देती है
किनारे के लिये कश्ती किनारा छोड़ देती है
कशीदा कारियां हैं तोहमतों की दामन ए दिल पर
ये दुनिया इस लिये दामन हमारा छोड़ देती है
ज़हीर राज़
राष्ट्र प्रेम की रसधारा को,
निर्झर की तरह बहाता चल।
आनंद मिलेगानिजी अंतस को,
तू वंदे मातरम् गाता चल।
जीवन एस रजक
सब की नजरों में आ चुका हूं मैं
खा़क इतनी उड़ा चुका हूं मैं
अब मैं बैठा हूं चैन से वरना
रास्तों को थका चुका हूं मैं
रईस अनवर
कल शाम ये हुआ कि तुम भीड़ में थे तन्हा
लौट आईं मेरी नजरें इक इंतेखा़ब ले कर
परवेज़ अख़्तर
दुश्मनी आंख पे पर्दा डाला
गार पर जाले सजे मकड़ी के
साजिद प्रेमी
चराग़ ए इश्क़ हूं जलता रहूंगा
हवा की आंख में खलता रहूंगा
मन्नान फ़राज़
मुहब्बत फूलती-फलती रही भोपाल में मेरे
कि नफ़रत ख़ुदकुशी करती रही भोपाल में मेरे।
महावीर सिंह
ज़िंदगी ख़ुश न हो फिर मेरे पलट आने पर
मौत ने मुंह न लगाया तो पलट आया हूं
शाहनवाज़ असीमी
हटा ली वक़्त रहते आंख क़िस्सा गो की आंखों से
मुझे उस की कहानी पर भरोसा होने वाला था
निवेश साहू
तेरी पहचान के क़ाबिल हुआ मैं
जब अपने आप में दाख़िल हुआ मैं
गोविंद गीते
दुनिया तेरी आवाज़ पे हम नौकरी पेशा
चुप चाप बढ़ाते हैं क़दम कुछ नहीं कहते
आमिर अज़हर
भले बलंदी ज़रा कम हो पर वो अपनी हो
मक़ाम चाहिये ख़ुद अपना बना बनाया नईं
सुभाष पाठक ज़िया
लग रहा है इश्क़ आ पहुंचा है दरवाज़े तलक
ख़ुशबुएं आने लगी हैं जानी पहचानी मुझे
नज़ीर नज़र
इसके बाद आयोजित व्याख्यान सत्र में राज्य निर्वाचन आयुक्त एवं वरिष्ठ साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव ने ‘वन्दे मातरम् की साहित्यिक निष्पत्ति’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए इसे भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि, दुनिया के अधिकतर राष्ट्रगीत उस देश के संघर्ष के समय पैदा हुए हैं। चाहे फ्रांस हो या अमेरिका, उनकी उत्पत्ति क्राइसिस के क्षण हुई है। स्वयं ब्रिटेन का राष्ट्रगीत जैकोबाइट विद्रोह के समय की देन है। ये कहीं किसी राष्ट्र नायक के इर्द- गिर्द विकसित हुए (डेनमार्क, हैती आदि) तो कहीं देश के ध्वज के संदर्भ में (होंडुरास, संयुक्त राष्ट्र जमेरिका) कहीं ये शुद्ध प्रार्थना हैं, तो कहीं ये शस्त्र उठाने का आह्वान, (स्पेन, फ्रांस आदि) कहीं ये लोकगीत (जापान, श्रीलंका, म्यानमार)। लेकिन हर जगह राष्ट्रगीत का असंदिग्ध सम्मान होता है।वंदे मातरम् भी संघर्ष की भट्टी में तपा वह गीत है जिसे गुनगुनाना भी औपनिवेशिक राजसत्ता के दौर में एक आपराधिक कृत्य था, क्योंकि उसकी स्वर लहरी से साम्राज्यवादियों को नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता था।
इसी सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार इक़बाल मसूद ने ‘उर्दू साहित्यिक परंपरा में राष्ट्रबोध की अभिव्यक्ति और वन्दे मातरम्’ विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि, उर्दू प्रेम और मानवता की भाषा है, जहाँ सभी के लिए सम्मान और स्नेह निहित है। प्रेम के बिना स्थायी शांति संभव नहीं। उर्दू में राम-कृष्ण और पैग़म्बर मुहम्मद व हज़रत अली सभी सत्य, न्याय और अन्याय के विरोध के प्रतीक हैं। यही उर्दू की शक्ति है, इसी कारण ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय गीत का विरोध अनुचित है, क्योंकि वह देशप्रेम, आत्मसम्मान और ऊँचा सिर रखकर जीने की प्रेरणा देता है।
इस सत्र का संचालन डॉ. नुसरत मेहदी ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने कहा कि उर्दू साहित्य की दृष्टि से ‘वंदे मातरम्’ एक गहरी देशभक्ति से युक्त काव्य रचना है, जो वतन को एक नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य के रूप में प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि उर्दू साहित्य में प्रतीक और रूपक की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है और ‘वंदे मातरम्’ में माँ का रूप भी एक सांकेतिक और अर्थपूर्ण प्रतीक है, जो हमारी सभ्यता, इतिहास और मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इस दृष्टि से ‘वंदे मातरम्’ उर्दू साहित्य के लिए कोई बाहरी रचना नहीं, बल्कि उसी साहित्यिक परंपरा का हिस्सा है जहाँ वतन, प्रेम और पहचान एक साथ जुड़ते हैं।
तदुपरांत प्रख्यात हास्य कलाकार एवं सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर रहमान ख़ान (मुम्बई) द्वारा “गिगल-ए-आज़म” के अंतर्गत एकल नाट्य प्रस्तुति दी, जिसमें उर्दू साहित्य की हास्य-व्यंग्य की समृद्ध परंपरा को प्रभावशाली व रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया।
इस दिन के अंतिम सत्र में “उर्दू का फ़िल्मी सफ़र - "चलते चलते” शीर्षक से संगीतात्मक नृत्य-नाट्य प्रस्तुति का मंचन हुआ। इस प्रस्तुति में प्रख्यात सिने अभिनेत्री मीना कुमारी के जीवन व उनके कृतित्व को भी रेखांकित किया गया। इसके लेखक एवं निर्देशक डॉ. एम. सईद आलम (दिल्ली) रहे। प्रस्तुति में अभिनय तरन्नुम अहमद, कथक आस्था गुप्ता, संगीत एवं स्वर फ़र्रुख़ बेग, वाद्य पर लईक़ अहमद एवं प्रीतम बाबू ने दिया। परिकल्पना रेहान ख़ान की रही तथा संचालन रुशदा जमील (भोपाल) ने किया।
उपरोक्त के अतिरिक्त जश्ने उर्दू के एक अन्य मंच पर छतनारा, भोपाल के सहयोग से आयोजित "कारवाँ लिट्रेरी ओपन माइक” के अंतर्गत बड़ी संख्या में युवाओं ने विभिन्न विधाओं व कलाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
इस प्रकार जश्ने उर्दू - 2026 का तीसरा दिन उर्दू भाषा, साहित्य और संस्कृति की बहुरंगी अभिव्यक्तियों के साथ श्रोताओं के लिए एक स्मरणीय अनुभव बन गया।
अंतिम दिन के कार्यक्रम
व्याख्यान, शायरात मुशायरा, संवाद सत्र और क़व्वाली होंगे मुख्य आकर्षण
मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग तथा आयुक्त संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्सव “जश्ने उर्दू–2026” का चौथा एवं समापन दिवस 2 फ़रवरी 2026 को गोलघर, शाहजहांनाबाद, भोपाल में आयोजित किया जाएगा।
समापन दिवस के प्रथम सत्र में “चिलमन” कार्यक्रम के अंतर्गत व्याख्यान एवं शायरात मुशायरा आयोजित होगा।
व्याख्यान सत्र में डॉ. सैयद मुबीन ज़हरा (एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय) “आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक उर्दू की ऐतिहासिक साहित्यिक परंपराएँ” विषय पर वक्तव्य देंगी। वहीं डॉ. इशरत नाहीद (एसोसिएट प्रोफेसर, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, लखनऊ) “उर्दू फ़िक्शन में स्त्री विमर्श: स्वायत्त चेतना की यात्रा” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगी। इस सत्र का संचालन स्तुति अग्रवाल (सिरोंज) द्वारा किया जाएगा।
इसके पश्चात आयोजित शायरात मुशायरा में मलका नसीम (जयपुर), हिना हैदर रिज़वी (पटना), डॉ. क़मर सुरूर (अहमदनगर), मणिका दुबे (जबलपुर), पूनम मीरा (गुरुग्राम) तथा भोपाल से परवीन सबा, गौसिया ख़ान सबीन, अपर्णा पात्रिकर और ख़ुशबू श्रीवास्तव अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगी। मुशायरे का संचालन डॉ. अंबर आबिद करेंगे।
अगले सत्र में आयोजित संवाद सत्र में रंगमंच एवं सिनेमा के वरिष्ठ कलाकार संजय मेहता, राजीव वर्मा एवं श्रीमती रीता वर्मा “उर्दू के साथ मेरी यात्रा” विषय पर अपने अनुभव साझा करेंगे। इस सत्र का संचालन विनय उपाध्याय करेंगे।
समापन सत्र में आदित्य सिंह गौर (भोपाल) द्वारा प्रस्तुत वन्दे मातरम् विशेष आकर्षण रहेगा। इसके पश्चात प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरण किया जाएगा।
अंतिम प्रस्तुति के रूप में प्रख्यात गायक एवं क़व्वाल रईस अनीस साबरी की क़व्वाली समापन दिवस को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गरिमा प्रदान करेगी।
पूरे कार्यक्रम का संचालन समीना अली सिद्दीक़ी (भोपाल) द्वारा किया जाएगा।
